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मुख्यमंत्री अखिलेश यादव
मुख्यमंत्री अखिलेश यादव

और झगड़ो के साथ बढ़ती गयी मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की लोकप्रियता 

लड़ाई से होती है फजियत, पर यहाँ निखरती गयी शख्सियत

जो कल सोना था, विवादों की आग मे तप कर बना कुन्दन

——– हर घर अखिलेश-घर-घर अखिलेश ——-

गाँव-शहर..गली-मोहल्ले.. कैम्पस या खलियान- हर जगह.. हर जुबाँ पर अखिलेश का ही नाम

देश के हरएक बड़े न्यूज चैनल ने अखिलेश को बताया सबसे लोकप्रिय सीएम प्रतियाशी- प्रदेश का सबसे बड़ा नेता

एक बूढ़े मुखिया को सबसे लोकप्रिय और सबसे काबिल युवा जननायक को मुख्य भूमिका मे लाकर अपनी कुर्सी देनी थी।

इसे इत्तेफाक कहें या सौभाग्य, पार्टी और आवाम में सबसे काबिल और हर कसौटी पर खरा उतरने वाला ये जननायक उनका बेटा ही था। तो जाहिर है इस मुखिया/बाप को अपने बेटे को अपनी विरासत/अपनी कुर्सी देनी ही थी।

इतिहास की कुछ कीलो..आरोपों के दाग वाली ये कुर्सी किसी बेदाग को दागदार कर सकती थी। विरासत की ये कुर्सी इस जननायक की सियासत की रुकावट बन सकती थी।

अयोध्या काण्ड… कासेवक.. परिवारवाद… जातिवाद.. तुष्टिकरण.. यादववाद..मुस्लिमपरस्ती..जंगलराज..गुन्डाराज.।

आरोपों के इन काले बादलों में कब तक छिपता रहता ये चाँद। साढ़े चार मुख्यमंत्री जैसे फिखरे सह रहे अखिलेश ज्यों-ज्यों गृह युद्ध के सूरज मे तपते रहे वैसे-वैसे उनकी शख्सियत निखरती रही। एक्सप्रेस-वे और मैट्रो की रफ्तार की पटरी पर कट गये विरोधियों के परिवारवाद के आरोप। विकास की तलवार से अखिलेश ने अपने हर प्रतिद्वंद्वी को धराशायी कर दिया।

एन्टीइनकम्बैन्सी का न खतरा रहा न विरासती कुर्सी के दाग, टीपू की हर लड़ाई ने विकास की तलवार से हर किला फतह कर लिया।