बच्चों की मौत

Son sale out in thirty thousand save for wife life in Kannauj

गरीबी की मारः गर्भवती पत्नी को बचाने के लिए बेटे का तीस हजार में कर दिया सौदा

गर्भवती पत्‍‌नी को बचाने के लिए एक गरीब पिता ने अपने बेटे को बेचने का फैसला कर लिया। पांच हजार रुपये के लिए मामला फंसने पर लोगों को शक हुआ तो पुलिस को सूचना दी। मामला खुला तो पुलिस ने पीड़ित की आर्थिक मदद देकर महिला का इलाज शुरू कराया। ये हृदय विदारक मामला है तिर्वा स्थित मेडिकल कॉलेज का।

बुधवार को सौरिख थाना क्षेत्र के एक गांव में रहने वाला शख्स अपनी पत्‍‌नी का इलाज कराने यहां पहुंचा था। सात माह का गर्भ होने के कारण महिला की हालत बेहद नाजुक थी। उसके साथ पांच वर्षीय पुत्री और एक वर्षीय बेटा भी था। पीड़ित के मुताबिक उसने छिबरामऊ स्थित 100 शैया अस्पताल में पत्नी को भर्ती कराया तो वहां चिकित्सकों ने पांच यूनिट खून की जरूरत के साथ ऑपरेशन का खर्चा 30 हजार रुपये बताया। इस पर वह मेडिकल कॉलेज पहुंचा तो यहां भी डॉक्टरों ने खून का इंतजाम करने के लिए कह दिया।

कहीं से सहारा न मिलने पर उसने अपने जिगर के टुकड़े को बेचने का फैसला कर लिया। एक फल विक्रेता के माध्यम से 30 हजार रुपये में सौदा तय हुआ। पांच हजार पर रुपये पर मामला फंस गया। विवाद बढ़ा तो लोगों को बच्चा बेचे जाने का शक हुआ। उन्होंने इसकी सूचना पुलिस को दी। सूचना पर कोतवाली प्रभारी आमोद कुमार मौके पर पहुंचे और पीड़ित महिला का इलाज शुरू कराया। उनकी पहल पर अन्य पुलिस वाले भी आगे आए और पीड़ित की आर्थिक मदद की। अब उसके लिए रक्तदान भी करेंगे।

मुफलिसी की मार से टूट रहा था मोह का धागा कन्नौज : परिस्थिति जो न कराए कम है। ये मुफलिसी की मार ही है कि जो एक बाप को अपना बेटा बेचने के लिए मजबूर कर देती है, लोग बेटी बेचने की सलाह देने लगते हैं। दर्द से तड़प रही पत्नी की आह के बीच जब वह अपने बच्चों को बेचने के बारे में सोचता होगा तो उस पर क्या गुजरती होगी। पाच साल की बेटी, उफ! कितना दर्दनाक मंजर होता वो जब चंद पैसों के लिए उसकी बेटी का हाथ छूटकर न जाने किसके हाथ में दे दिया जाता। शायद इसीलिए उसने बेटी की बजाय बेटे को बेचना ज्यादा सही समझा।

तिर्वा मेडिकल कॉलेज में बेटे को बेचने जा रहे उस शख्स की कहानी मजबूरी की ऐसी स्याही से लिखी गई है, जिसका हर अक्षर काला ही है। गुरबत की छाया ऐसी रही कि जन्म से ही गरीबी का दंश झेलना पड़ा। खेती-बाड़ी तो छोड़िए रहने के लिए घर तक नहीं था। शादी के बाद पत्‍‌नी के साथ दिल्ली जाकर एक कंस्ट्रक्शन कंपनी में मजदूरी की। कुछ दिन बाद ही कंपनी बंद हो गई तो कहीं काम नहीं मिला और सौरिख स्थित गाव लौटना पड़ा। रहने के लिए जगह नहीं थी तो कहीं से पॉलीथिन का इंतजाम कर फुटपाथ पर तंबू ताना और गुजर बसर करने लगे। मुश्किलें थीं कि कम होने की बजाय लगातार बढ़ती ही जा रही थीं। एक दिन अचानक सात माह की गर्भवती पत्नी की हालत बिगड़ी । उसे रक्तस्त्राव होने लगा।

इलाज के लिए हर जगह हाथ-फैलाया, लोगों से मदद मागी मगर एक भी हाथ मदद को आगे नहीं आया। सलाह मिली तो ये कि दिल्ली में बेटी को बेच दो, अच्छा-खासा धन मिल जाएगा। उसे ये सलाह गवारा न हुई और पत्नी को एक अस्पताल में भर्ती कराया। 30 हजार रुपये का खर्चा उठाना किसी भी तरह मुमकिन नहीं था। इसीलिए वह तिर्वा स्थित मेडिकल कॉलेज पहुंचा और यहा एक बेटे को बेचने का फैसला कर लिया। गनीमत रही कि कोतवाली प्रभारी आमोद कुमार मौके पर पहुंच गए और मासूम दुधमुंहे बच्चे को परिजनों से नहीं बिछड़ने दिया।

पुलिसकर्मी करेंगे रक्तदान कोतवाली प्रभारी आमोद कुमार ने जब पीड़ित की कहानी सुनी तो उसकी आर्थिक मदद के साथ दवा व खाने पीने का इंतजाम किया। डॉक्टरों ने खून की कमी बताई तो खुद रक्तदान करने का फैसला कर लिया। उनकी पहल पर चौकी प्रभारी बृजेंद्र पाल सिंह, उपनिरीक्षक सघन शुक्ला व कास्टेबल सुदेश कुमार भी रक्तदान करने को तैयार हो गए। कोतवाली प्रभारी कहते हैं कि पीड़ित की कहानी मार्मिक है। सभी को उसकी मदद करनी चाहिए ताकि ऐसी घटनाएं न हों। पीड़ित महिला का इलाज शुरू करा दिया है। देखरेख के लिए पुलिस को लगाया गया है।

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